KT.v-1.4 Decorum & Boundation in Life

मनुष्य का मन स्वभाव से ही चंचल होता है अब बालकों को देखो माता पिता कहेंगे नदी के पास मत जाना वन में मत खेलना वो अवश्य वही करेंगे जिसके लिए मना किया गया |

बंधन को तोड़ने का जो रोमांच है वो मनुष्य के मन को सदा ललचाता है  परंतु बंधन और मर्यादा में बड़ा अंतर है| कभी कभी बंधन तोड़ना उचित है परंतु मर्यादा तोड़ना नही चाहे वो प्रेम की हो या शत्रुता की हो या फिर अतिथि की|

फिर ये प्रश्न उठता है की मर्यादा है क्या हमें कैसे पता हो कि हमें किस सीमा को पार नही करना चाहिए | जैसा व्यवहार आप अपने अपने लिए दूसरे से चाहते हैं वास्तविकता में वही आपकी भी मर्यादा है|

 जो सीमा आप किसी दुसरे को पार नही करने देना चाहते वही सीमा आपकी भी है जिस दिन से आप अपने मन से ये प्रश्न कर प्रारम्भ कर देंगे तब से न आपसे कोई मर्यादा भंग होगी न ही कोई अपराध होगा इसीलिए कहा जाता है जब आपका मन नियन्त्रण हो तो आपके ह्रदय के साथ साथ ईश्वर आपके मन में भी निवास करता है जिससे आप अपनी मर्यादा का प्रश्न पूछोगे तो वो कभी अनुचित उत्तर नही देता|

Contemplate man by nature is fickle, If parents bound their children do not go to the river, not play in forest but for which they are restricted will do the same.

That adventure of breaking boundation always entices human mind.

But there is huge difference in binding and dignity. Sometimes breaking the bond is reasonable but not breaking decorum whether it is love or enmity or guest.

Then the question arises what the dignity is? How do we know how we should not cross the limit?

For you, the behavior you expect from other in reality that is your decorum. The limitation you expect from others is your limitation.

The day you begin to ask these questions in your mind from that day you will not break any decorum nor commit any crime.That’s why there is a saying when you have control over your mind & heart God dwells with you too.If you ask a question of the dignity he ever does not answer inappropriate

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