KT.v-1.6 Revenge : to be taken or not

एक अग्नि दूसरी अग्नि को कभी शांत नही कर सकती वो उसे और अधिक प्रज्वलित ही करती है अपमान से जन्म लेने वाली अग्नि का प्रतिकार प्रतिशोध नहीं हो सकता क्योंकि प्रतिशोध की अग्नि अपमान की अग्नि से प्रचण्ड होती है तो उसका प्राण क्या है अपमान की अग्नि से प्रान पाने का मार्ग प्रतिशोध नहीं शान्ति है स्वयं के विकास से अपने आप को इतना बड़ा बना लो की आपका शत्रु आपका अपमान करने का प्रयास ही न कर पाए अन्यथा यदि आप प्रतिशोध चाहते है शत्रु भस्म चाहते है तो स्वयं को भी जलना होगा क्योंकि प्रतिशोध की अग्नि स्वयं को भी जलाती है और ऐसा आप कदापि नही चाहेंगे   

 

 

A fire with another fire could never satisfy it will ignite more; Vengeance is not an option for the fire born by disrespect because the fire of vengeance is more violent then fire of disrespect.Peace is the only way to get rid of fire of vengeance. By own development make yourself so big your enemy may not attempt to insult.But if you still want vengeance or to end your enemy then you too have to burn yourself because the fire of revenge burn yourself too and you do not want that.

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