KT.v-1.6 Revenge : to be taken or not

एक अग्नि दूसरी अग्नि को कभी शांत नही कर सकती वो उसे और अधिक प्रज्वलित ही करती है अपमान से जन्म लेने वाली अग्नि का प्रतिकार प्रतिशोध नहीं हो सकता क्योंकि प्रतिशोध की अग्नि अपमान की अग्नि से प्रचण्ड होती है तो उसका प्राण क्या है अपमान की अग्नि से प्रान पाने का मार्ग प्रतिशोध नहीं शान्ति है स्वयं के विकास से अपने आप को इतना बड़ा बना लो की आपका शत्रु आपका अपमान करने का प्रयास ही न कर पाए अन्यथा यदि आप प्रतिशोध चाहते है शत्रु भस्म चाहते है तो स्वयं को भी जलना होगा क्योंकि प्रतिशोध की अग्नि स्वयं को भी जलाती है और ऐसा आप कदापि नही चाहेंगे   

 

 

A fire with another fire could never satisfy it will ignite more; Vengeance is not an option for the fire born by disrespect because the fire of vengeance is more violent then fire of disrespect.Peace is the only way to get rid of fire of vengeance. By own development make yourself so big your enemy may not attempt to insult.But if you still want vengeance or to end your enemy then you too have to burn yourself because the fire of revenge burn yourself too and you do not want that.

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KT.v-1.5 Think Before degrading someone

मनुष्य एक जीव होते हुए भी शेष जीवों से भिन्न है क्यूँ कारण मनुष्य जीवन समाप्त होने के पश्चात भी जीना चाहता है और इसका केवल एक ही मार्ग है सम्मान जो मनुष्य की मृत्यु के पश्चात भी जीवित रहता है उस सम्मान को पाने के लिए मनुष्य वर्षों प्रयास और प्रयत्न करता है उस सम्मान को पाने के लिए मनुष्य वर्षों प्रयास और प्रयत्न करता है और ऐसे में शत्रु के लिए सबसे सरल लक्ष्य बन जाता है आपका सम्मान

हम अपने शत्रु का अपमान करके उसके वर्षों के कमाए हुए सम्मान को छिन्न भिन्न कर देना चाहते हैं परंतु कर्म करने से पूर्व परिणाम पर एक बार विचार अवश्य कर लीजिएगा वर्षों से संचित शत्रु के मान को भंग कर के आप को संतोष अवश्य मिल सकता है परंतु वो शत्रु अपने जीवन के शेष हर पल को उस अपमान के उत्तर में लगा देता है तो इसीलिए सावधान रहिए किसी का अपमान आपके लिए भी हानिकारक हो सकता है

Humans are creatures of a species different from the rest the reason Man wants to live life even after completion and for that only one way is honor which stays with human after life. Man put year of efforts to earn that respect but that respect is easy target for  enemy.

If you try to destroy the respect of your enemy by dis-respecting him who he earned in years, but before action consider the outcome once.By dissolving respect accumulated over the years of enemy can definitely get satisfaction to you but the rest of his life every moment that enemy will try to hit back. So be aware someone’s disrespect could be dangerous for you too.

KT.v-1.4 Decorum & Boundation in Life

मनुष्य का मन स्वभाव से ही चंचल होता है अब बालकों को देखो माता पिता कहेंगे नदी के पास मत जाना वन में मत खेलना वो अवश्य वही करेंगे जिसके लिए मना किया गया |

बंधन को तोड़ने का जो रोमांच है वो मनुष्य के मन को सदा ललचाता है  परंतु बंधन और मर्यादा में बड़ा अंतर है| कभी कभी बंधन तोड़ना उचित है परंतु मर्यादा तोड़ना नही चाहे वो प्रेम की हो या शत्रुता की हो या फिर अतिथि की|

फिर ये प्रश्न उठता है की मर्यादा है क्या हमें कैसे पता हो कि हमें किस सीमा को पार नही करना चाहिए | जैसा व्यवहार आप अपने अपने लिए दूसरे से चाहते हैं वास्तविकता में वही आपकी भी मर्यादा है|

 जो सीमा आप किसी दुसरे को पार नही करने देना चाहते वही सीमा आपकी भी है जिस दिन से आप अपने मन से ये प्रश्न कर प्रारम्भ कर देंगे तब से न आपसे कोई मर्यादा भंग होगी न ही कोई अपराध होगा इसीलिए कहा जाता है जब आपका मन नियन्त्रण हो तो आपके ह्रदय के साथ साथ ईश्वर आपके मन में भी निवास करता है जिससे आप अपनी मर्यादा का प्रश्न पूछोगे तो वो कभी अनुचित उत्तर नही देता|

Contemplate man by nature is fickle, If parents bound their children do not go to the river, not play in forest but for which they are restricted will do the same.

That adventure of breaking boundation always entices human mind.

But there is huge difference in binding and dignity. Sometimes breaking the bond is reasonable but not breaking decorum whether it is love or enmity or guest.

Then the question arises what the dignity is? How do we know how we should not cross the limit?

For you, the behavior you expect from other in reality that is your decorum. The limitation you expect from others is your limitation.

The day you begin to ask these questions in your mind from that day you will not break any decorum nor commit any crime.That’s why there is a saying when you have control over your mind & heart God dwells with you too.If you ask a question of the dignity he ever does not answer inappropriate

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