KT.v1.3 How you can figure out when your pride turn into ego

कर्म अभिमान और अहंकार ये तीनो सुनने में एक जैसे लगते हैं परंतु तीनों का अर्थ भिन्न होता है और परिणाम भी तीनो का आरम्भ प्रेम से होता है स्वयं से प्रेम |

परिश्रम हमारे मन में गर्व को जन्म देता है और सफलता अभिमान जागते है |  यहाँ तक तो ठीक है पर जब ये भावना अहंकार बन जाती है तब वो समस्या बन जाती है क्योंकि सबसे बुरा अंत अहंकारी का ही होता है |

परंतु मनुष्य के लिए पहली यही है की पहचान कैसे जाए  अहंकार जाग गया है और उसका दमन आवश्यक है  उसका उत्तर आपका मन देगा | जब तक आप स्वयं से प्रसन्न है जब तक आप सबसे ऊंचा उठने का प्रयास कर रहे हैं तब तक ठीक है |

परंतु जब आप के मन में दूसरों को नीचा समझने का भाव आजाये तो सावधान हो जाइए क्योंकि यही अहंकार है जो वास्तव में आपको हीन कर रहा है |

Karma Pride and Ego, these three seem the same, but the three means of hearing varies and results too.Love is the beginning of these three which is self-love.

Labor gives rise to pride and success in our mind is awake pride. Even then, when the emotion becomes ego then it becomes a problem because It is the bad end of egoist/arrogant.

But the riddle for human is how to identify His/Her ego has awakened and must suppressed. When you are pleased with yourself you are most happiest person. Till you’re trying to get up the highest fin.

but when you see for a sense of under estimating in the minds for others, so be careful and go down because the ego is actually increasing hatred toward others in you

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